लापोड़िया के बारे में

राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर, 200 घरों का एक गाँव लापोड़िया ने उन्नत जल संरक्षण प्रथाओं और एक संस्कृति को अपनाया है, जिसे उन्होंने तीन दशकों में तात्कालिक एवं निपुण किया है।राजस्थान में 1977 के भीषण सूखे ने ग्रामीण समुदायों की आजीविका को प्रभावित किया और कई गरीब परिवारों ने काम की तलाश में आसपास के शहरों की ओर पलायन करना शुरू कर दिया। इस स्थिति से निपटने हेतु , लापुडिया गाँव के एक प्रगतिशील निवासी - लक्ष्मण सिंह ने जल संसाधन के तत्काल विकास हेतु ग्राम विकास नवयुवक मंडल, लापोड़िया (जीवीएनएमएल) के बैनर तले युवाओं को संगठित किया।

ग्राम विकास नवयुवक मंडल, लापोड़िया के कार्यकर्ताओं ने स्थानीय रूप से एक अनोखी और सरल तकनीक विकसित की है जिसे 'चौका प्रणाली' कहा जाता है। चौका प्रणाली शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में गांवों की उपलब्ध विकृत घास के मैदान / चारागाह या सामान्य गौचर भूमि को फिर से जीवंत करने के लिए एक स्वस्थाने वर्षा जल संरक्षण तकनीक है। यह पारंपरिक रूप से अनुशंसित वर्षा जल संरक्षण उपायों से अलग है।

चौका ’का शाब्दिक अर्थ है आयताकार परिक्षेत्र जिसमें ऊपर की ओर से आने वाले अतिरिक्त वर्षा जल के सुरक्षित निपटान हेतु तीन तरफ मिट्टी के पुश्तों या तटबंधों से बने एक आयताकार परिक्षेत्र का निर्माण करते हैं । चौका पद्धति में एक तरफ से छोड़े अंतराल के साथ तटबंधों की आंतरिक रूप से जुडी ऐसी श्रृंखला बनाते हैं, ताकि एक चौके से दूसरे चौके तक जल का प्रवाह बना रहे। ये निर्धारित अंतराल पर ढलान पर इस प्रकार निर्मित होते हैं जिससे अपवाह को रोका जा सके एवं अवशोषित होने तक एक क्षेत्र के बड़े हिस्से पर रुका रहे| चौका की अनुपस्थिति में, यह जल अपवाह के रूप में व्यर्थ हो सकता है एवं अपने साथ यह कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध, उपजाऊ तलछट को साथ ले जा सकता है । संग्रहित अपवाह जल को भूमि पर रहने का एक बढ़ा हुआ अवसर मिलता है,जिससे अन्तः स्राव एवं अंतःस्त्रवण में वृद्धि होती है है। जिससे कृषि योग्य भूमि की नमी में सुधार होता है और नीचे की ओर भूमि की उत्पादकता में वृद्धि होती है। इसके अलावा, यह भूजल पुनर्भरण करने में भी बहुत मदद करता है। भूजल पुनर्भरण में वृद्धि निचले स्तर में स्थित कुओं के स्वास्थ्य की दर को बढ़ाती है; अंततः, यह जल सिंचाई क्षमता में वृद्धि के साथ ही कम वर्षा वाले वर्षों में भी लोगों और पशुधन दोनों के लिए पेयजल संसाधनों की उपलब्धता को बढ़ाता है।

लापोड़िया में, वर्षा के जल की प्रत्येक बूंद का उपयोग करते हुए, चौका पद्धति ने जलभृतों को फिर से भर दिया है एवं गांव के पशुओं के लिए पेय जल के रूप में भी ये काम करते हैं। पर्याप्त होने के कारण , चौका तंत्र के किनारे किनारे घास की विभिन्न किस्मों को भी बोया गया है।


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